क्या देश के वित्तीय वर्ष में बदलाव की है जरूरत? जानने के लिए केन्द्र सरकार ने गठित की कमेटी

नई दिल्ली।केंद्र सरकार ने नई कमेटी बनाई है जो इस बात की पड़ताल करेगी कि क्या भारत को एक नए वित्तीय वर्ष की जरूरत है। यह कमेटी इसकी भी पड़ताल करेगी की अगर ऐसा निर्णय लिया जाता है तो देश का वित्तीय प्रभाव कैसे होंगे। इससे पहले भी भारत में ऐसा कदम उठाया जा चुका है।

1867 से चल रहा है वर्तमान प्रारूप

अप्रैल से मार्च के वित्तीय वर्ष का प्रारूप भारत में सन 1867 से चल रहा है। उससे पहले भारत में मई से अप्रैल के वित्तीय वर्ष का प्रारूप चलता था। यह परिवर्तन ब्रिटेन के वित्तीय वर्ष के अप्रैल से मार्च के प्रारूप के आधार पर बदला गया था।

वैश्विक नहीं है यह प्रारूप

दुनिया में बहुत से ऐसे देश हैं जहां 1 जनवरी से 31 दिसंबर को ही वित्तीय वर्ष के रूप में मान्यता दी गई है। हालांकि दुनिया में ज्यादातर देशों में 1 अप्रैल से 31 मार्च को वित्तीय वर्ष के रूप में मान्यता है। अमरीकी में वित्तीय वर्ष 1 अक्टूबर से 30 सितंबर के बीच होता है।

किन देशों ने बदले वित्तीय वर्ष

1976 के पहले अमरीका में वित्तीय वर्ष की शुरुआत 1 जुलाई से 30 जून होती थी।

भारत पहले भी कर चुका है प्रयास

1984 में केंद्र सरकार ने इस मामले के अध्ययन के लिए एलके झा कमेटी का गठन किया था।  1985 अप्रैल में कमेटी ने अपनी सिफारिश में कहा कि हम वित्तीय वर्ष को कैलेंडर वर्ष में तब्दील कर सकते हैं। कमेटी ने इसके पक्ष में कई तर्क दिए जिनमें सबसे खास मॉनसून का तर्क था।

सरकार ने नहीं मानी थी सिफारिश

तब सरकार ने सिर्फ मानसून की वजह से वित्तीय वर्ष बदलने से इंकार कर दिया था।

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